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गरीबी के हालात

Manoj Vyas

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गरीबी के हालात~
        
                                                    
                            
विकास की गाथाओं में गरीबी दफन हो जाती है
और देश के कोने कोने भुखमरी पैर फैलाती है।
प्रासादों के सामने बेचारी दरिद्रता कैसे टिकती
अमीरों के हाट बाजार में गरीबी टके सेर बिकती।
झोंपड़ियों में देखो अन्न के भी लाले पड़ जाते हैं
गोदामों में पड़े सामंती गेहूँ यों ही सड़ जाते हैं।
नेताओं के कुत्ते जहाँ रोजाना दूध मलाई खाते हैं,
निर्धन शिशु बेचारे दूध की खातिर बिलबिलाते हैं।
सांसदों के भत्तों का बिल तो पल में पास हो जाता
गरीब वृद्धावस्था पेंशन को कितने चक्कर लगाता।
विदेशी लोगों की आवभगत में शाही पकवान बनते
उधर सड़कों पर दो जून की रोटी को भी तकते।
साहूकार ब्याज पर भी ब्याज चढ़ाए जाता है,
निर्धन कर्ज के तले जीवन भेंट कर जाता है।
अय्याश अड्डों के भी सरेआम ठेके दे दिए जाते हैं
अकिंचन बेटियों के जहाँ मोल भाव किए जाते हैं।
हालातों की बेड़ियाँ मजबूर को जकड़ लेती है
साँसों की जुगत में गलत राह पकड़ लेती है।
किंचित् स्वाभिमान भी पग पग पर ठगा जाता है
मजबूरियों में वो चोर उचक्का भी बन जाता है।
-मनोज व्यास
2 महीने पहले
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