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यह धर्म है कैसा

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लहूलुहान है, मन
        
                                                    
                            
टूटा है, तन
देख धर्म की पाश्विकता
छिन्न- भिन्न होती जा रही
मानवता तेरा रूप- स्वरूप
क्या यही है, तुम्हारा विद्रूप रूप।।

आश्रय देता एक देश नारी को
बन कर मानवता का उपवन
दूजा राष्ट्र सतीत्व-पवित्रता भंग कर
घर बार संसार उजाड़ता लुटता
जीवन को बार बार
बोलो धर्म क्यों ?क्यों? हो चुप
क्या मर गई तेरी अंतरात्मा का स्वरूप?
करना होगा मनन , करना होगा चिंतन
एक नहीं सौ बार
धिक्कार है ,तुझे
चुल्लू भर पानी में डूब मरो
मानवता को तुम कर रहे शर्मसार
मानवता को तुमकर रहे हो शर्मशार।।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे पाशविक अत्याचार से संदर्भित।।
- मनोज सिन्हा
2 वर्ष पहले
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