तेरी लेखनी से
सृजित हो रोज कोई
नादान सी कल्पना
हो जिसमें सुस्मित स्नेह और प्रीत
मिलने को जी चाहे ह्रदय से
अगन उठे धीर-गंभीर
हो प्रेम की वसुंधरा पर कुछ ऐसा
आस्था और विश्वास का होता रहे मिलन
छंटता रहे अनास्था का धुंध
विरह में भी हो मिलन का अहसास
प्रेम ,प्रीत, प्रणय संगीत हो परिपूर्ण।।