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प्रकृति का स्पर्श

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मंत्रमुग्ध हुआ मन का मानस
        
                                                    
                            
देख प्रकृति का सुकुमार आंगन
जग भरा प्रकृति के विविध से सारा
झरने ,झंझावात, झांकते हर ओर
नदियां कल- कल बहती जोर-जोर
खग करते नित्य -सांध्य कलरव गान
भोर -सांझ के पहरों का हो रहा विराम
नीड़ चाहता अपने रिक्त को भरना
खग भी चाहते सानिध्य से नीड़ के रिक्त को भरना
खग भी चाहते सानिध्य से नीड़ के रिक्त को भरना।।
- मनोज सिन्हा
2 वर्ष पहले
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