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काव्य सी हो तुम

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            छंदों में तुम
        
                                                    
                            
बहती हो सदा
अलंकारों में सज
कर तुम
काव्य सी प्रतीत
होती हो तुम
कविता सी
दिखती हो तुम।।

मैं सोचता हूं
जीवन के हर
प्रसंग में बस
गई हो तुम
शब्दों का श्रृंगार कर
पदों में जब आती हो
भावों का स्वरूप कुछ
इंद्रधनुष सा लगता है
रंग कितने विविध से
आते हैं, मैं भ्रमित सदा
हो जाता हूं, आती रहना
तुम! हर पल शब्द, छंद
पदों में काव्य बन कर तुम
बहती रहना जीवन-नद में
तुम सरस सरिता कविता की
अक्षय- निधि बन कर तुम
हां! तुम काव्य जैसी हो तुम
हां! तुम काव्य जैसी हो तुम।।

- मनोज सिन्हा 
2 वर्ष पहले
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