मुद्दत हुए
मुलाकातों के
मानों छाए हैं
बादल हालातों पे
कहीं से दिखती नहीं चाहत
होंगी मुरादें कैसे पूरी
मुकम्मल तो कोई नहीं
न दरिया, न समंदर
बेरुखी हो ऐसी तो
जीवन पर छाए रहेंगे
काले काले बादल
छिप जायेगें ,उसमें
आफताब और महताब सभी।