विज्ञापन

धूप छाया

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धूप- छाया का अनुक्रम
        
                                                    
                            
नित्य रहता निरंतर, जैसे
जीवन की सांसें चलती सतत
प्राणों की धूप छाया बन कर।।

परिवेश प्रकृति की है, अद्भुत सी
लीला इसकी है, निराली
बुनती रचती सम -सा ,बिना भेद भाव
शीतलता, ऊष्णता,वर्षा -पानी
वसंत भी आता धर कर रूप सलोना
भरता जाता जीवन में हरियाली
देता नैनों को अभिराम
रहता सदा वह, अविराम।।

गमनागम प्रकृति का बदलता
नहीं कभी स्वरूप अपना
अचल -अटल रह कर दे जाता
संदेश सदा अविचल रहने का
जीवन भी है, एक धूप
आता -जाता है,सुख -दुःख
कभी छाया तो कभी धूप बन कर
कभी छाया तो कभी धूप बन कर।।
-मनोज सिन्हा
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Sanjay Nirala

42 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12437 कविताएं

View Profile