चिर संचित विराग
मेरे नैनों में कहां?
मेरे उर में खिलता है
पुष्प सौरभ सा मुस्कान
करुणा, अवसाद, विषाद
जो थे व्याप्त मेरे जीवन में
घुल कर बह गए
दृग से अश्रु के मोती बन
शेष जो रह गए विनष्ट हो गए
पश्चाताप की ज्वाला में जलकर
चिर संचित विराग
मेरे नैनों में कहां?
घन रंगीले आते- जाते
मंडराते धरा के सीने पर
झूम -झूमकर गाते गीत घन
फिर बरसते जी भर कर
प्लावित हो जाती धरा जल से
लेकिन विचलित होता कहां ? मैं
प्रकृति के तेजमय प्रवाहों से
मैं रहता सदा एक समान
समभाव लिए जीवन के विविध प्रसंगों में
चिर संचित विराग
मेरे नैनों में कहां?
क्या हर्ष ,क्या विषाद
इस जीवन के मधुर संगम में
मैंने तो पाया जीवन का आनंद
मधुर जीवन के मय को पीने में
जिसने भी चखा संसार रूपी मधु - प्याला
प्यासा भला वह कैसे? रह पाएगा प्यासा
द्वंदों से मुक्त, इस सुखमय जीवन में
चिर संचित विराग
मेरे नैनों में कहां? मेरे
उर में तो खिलता है
पुष्प सौरभ का मुस्कान।।
मनोज सिन्हा