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आघात बने उपहार

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            करुणा विव्हल हो
        
                                                    
                            
आंसू बन बह रही
मानो क्षिप्रा से कोई
फूट कर कोई पृथक
जलधारा उदास हो बह रही।।

व्यथा के द्वंद-भाव
आए कहां से? मत पूछो
यह रिपुओं की दी सौगात नहीं
मिला होगा, किसी अपनों से
गैरों में वह बात नहीं।।

अच्छा हुआ जो पाया आघात
अल्प ही सही बह गए द्वंदों की सारी बात
निर्मल हुआ मन रो कर
मन, आंख, हृदय आबद्ध हुआ
संबल देने को निःस्वार्थ
पाया मैंने अपने ही जीवन में
अपनों से मिला मौलिक यथार्थ
अपनों से मिला मौलिक यथार्थ।।
2 वर्ष पहले
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