करुणा विव्हल हो
आंसू बन बह रही
मानो क्षिप्रा से कोई
फूट कर कोई पृथक
जलधारा उदास हो बह रही।।
व्यथा के द्वंद-भाव
आए कहां से? मत पूछो
यह रिपुओं की दी सौगात नहीं
मिला होगा, किसी अपनों से
गैरों में वह बात नहीं।।
अच्छा हुआ जो पाया आघात
अल्प ही सही बह गए द्वंदों की सारी बात
निर्मल हुआ मन रो कर
मन, आंख, हृदय आबद्ध हुआ
संबल देने को निःस्वार्थ
पाया मैंने अपने ही जीवन में
अपनों से मिला मौलिक यथार्थ
अपनों से मिला मौलिक यथार्थ।।