हिज्र की आग में हर रोज़ पिघल जाता हूँ,
तेरी यादों के समंदर में ही ढल जाता हूँ।।
तू नहीं है तो उजालों का भरोसा कैसा,
धूप में भी मैं अँधेरों -सा यमचल जाता हूँ।।
दिल की वीरान गली पूछ रही है मुझसे,
किसकी आहट पे मैं हर बार बहल जाता हूँ।।
ज़िक्र आता है तेरा, आँख नम हो जाती है,
नाम सुनते ही मैं ख़ामोश-सा चल जाता हूँ।।
वक़्त मरहम भी लगाए तो असर क्या होगा,
तेरे बिछड़े हुए लम्हों में ही पल जाता हूँ।।
लोग कहते हैं भुला दे उसे अब ऐ दिल,
मैं मगर इश्क़ की रीतों से न बदल जाता हूँ।।
रब से बस इतनी दुआ है कि सलामत हो तू,
तेरी ख़ुशियों की दुआ देकर सँभल जाता हूँ।।
'एमके सिंह ' ये ग़ज़ल हिज्र की तहरीर नहीं,
ये वो आँसू है जो अल्फ़ाज़ में ढल जाता हूँ।।