विज्ञापन

तन्हा तन्हा रहता हूँ

Manoj Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तन्हा तन्हा रहता हूँ, फिर भी मुस्कुराता हूँ,
        
                                                    
                            
अपने हर टूटे ख़्वाबों को रोज़ सजाता हूँ।।

जिसने छोड़ा बीच सफ़र,उसका गिला क्या करूँ,
अपनी वफ़ा का दीपक मैं ख़ुद से ही जलाता हूँ।।

भीड़ में सभी अपने होने का दावा करते हैं,
मैं तो ख़ामोशी में भी अपना घर बनाता हूँ।।

ज़ख़्मों की विरासत को मैंने गले लगाया ,
दिल के दर्द का हर मोती से शेर सजाता हूँ।।

झूठ की हवाओं ने लाख बुझाना चाहा ,
सच की एक लौ लेकर ही उम्र बिताता हूँ।।

पत्थरों के शहर में दिल बचा के रखना था,
मैं तो फूल बनकर भी ख़ार अपनाता हूँ ।।

जिसको मेरी क़ीमत का आज नहीं एहसास,
उसकी याद में कब का ख़ुद को भुलाता हूँ।।

वक़्त की अदालत में फ़ैसला यही ठहरा,
जो वफ़ा निभाते हैं, वही आज़माए जाते हैं।।

अब तो किसी के आने की आस भी नहीं बाकी,
अपने ही मजबूत इरादों का हाथ थाम जाता हूँ।।

'एमके सिंह ' तन्हाइयों ने इतना तो सिखा दिया,
दर्द को दुआ करके हर दिल में समाता हूँ।।

 
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all