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कब तक दर्द भरी दास्ताँ..

Manoj Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कब तक दरिंदों - भेड़ियों की
        
                                                    
                            
शिकार होती रहेंगी ये बेटिया ,
कब तक सरेराह यूँ ही शर्मसार
होती रहेंगी हमारी ये बेटियाँ: ।।

इंसान के चेहरे में छिपे हैवान
आज खुलेआम मुस्कुराते फिरते हैं,
कब तक हैवानी हवस की तलब
होती रहेंगी ये हमारी बेटियाँ ।।

कभी होती निर्भया की चीख़ कभी
तेरह वर्षीय गंगानगर की मौन सिसकी,
कब तक अपनी दर्द भरी दास्ताँ को
लेकर सुर्खियों बटोरती रहेंगी ये बेटियाँ।।

जिस धरती पर बेटी को देवी कह कर
के अपने माथे को झुकाए जाते हैं,
क्यों? आज उसी धरती पर लाचार और
विवश हो,होटलों तड़पती रही है बेटियाँ?

अगर कानून सोता रहा,ज़मीर ख़ामोश रहा,
न्याय के खातिर कब तक खोती रहेगी बेटियाँ?
हर घर, हर दिल में इंसानियत का दीप जले,
नफ़रत वहशत से आर-पार होती रहेंगी ये बेटियाँ।।

हम सदा ईश्वर से यही दुआ करते हैं किसी माँ
की गोद कभी अपनी बेटियों से वीरान न हो ।।
बेटियों की मुस्कान सदैव बनी रहेगी, तब ही
सपनों और अधिकार की पहचान रहेंगी ये बेटियाँ।।।
- एम के सिंह
3 महीने पहले
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