हर एक अश्क में सदियों का एक अफ़साना मिला
हमें हर हँसी के पीछे दर्द का ख़ज़ाना मिला।।
जिसे भी अपना समझकर दिल के क़रीब रखा,
उसी से ज़ख़्म-ए-वफ़ा का नया नज़राना मिला।।
लबों ने चुप ही रहे, दिल मगर पुकारता रहा,
हर एक ख़ामोशी में दर्द का तराना मिला।।
वो छोड़कर भी गया तो अजब करम कर गया,
हमें हर अश्क में जीने का इक बहाना मिला।।
न बिक सकी कभी ग़ैरत, न झुक सका ये ज़मीर,
फ़क़त इसी वजह से हर क़दम ठिकाना मिला।।
जो रात भर मेरी पलकों पे मोतियों - सा रहा,
सुबह हुई तो वही अश्क का ख़ज़ाना मिला।।
लिखी जो दर्द से हमने मोहब्बतों की ग़ज़ल,हर
एक शेर पे दिल से "वाह-वाह"का नज़राना मिला।।
'एमके सिंह' ये अश्क यूँ ही नहीं आँखों में ठहरे,
इन्हीं से टूटे हुए दिल को फिर ठिकाना मिला।।