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घर ही असली धाम है (हास्य व्यंग)

Manoj Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सब कुछ कर दिया न्योछावर मैंने पत्नी के प्यार में,
        
                                                    
                            
वरना कब के डूब गए होते जीवन की मझधार में।।

शादी से पहले शेर था, जंगल तो मेरा नाम था,
शादी के बाद समझ में आया,घर हीअसली धाम था।।

पहले तो अपनी चलती थी,अब उनकी सरकार है,
मैं तो केवल मंत्री हूँ,उनके हाथ ही सब अधिकार है।।

तनख्वाह जैसे ही आती है सीधी उनके पास गयी चली,
मेरी जेब में बचते केवल, सिक्कों वाली दो-चार गली।।

बाज़ारों के चक्कर काटूँ, थैले लेकर के मुस्काऊँ,
अपने कपड़े बाद में लूँ,पहले उनकी पसंद निभाऊँ।।

गलती चाहे उनकी की हो, दोष हमेशा मेरा है,
वैवाहिक जीवन का नियम ही तो सबसे सुनहरा है।।

रूठें तो फिर चाय बनाऊँ, मानें तो मिठाई लाऊँ,
हँसकर कह दें"ठीक है" बस मैं स्वर्ग यहीं पर पाऊँ।।

दोस्त बुलाएँ चाय पे मुझको,पहले अनुमति लेनी है,
घर की संसद में हर मुद्दे पर, मुहर उन्हीं को देनी है।।

फिर भी सच है,उनकी हँसी से घर-आँगन खिल जाता है,
पत्नी साथ हो तो जीवन हर मुश्किल से मिल जाता है।।

सब कुछ कर दिया न्योछावर मैंने पत्नी के प्यार में,
अब हँसते-हँसते कटती उम्र, इस प्यारे परिवार में।।
- एम के सिंह
3 महीने पहले
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