इस कायनात में चाहने को न जाने कितनी-कितनी चीजें है
लेकिन जुर्रत है निगाहें चाहकर भी किसी और पर टिकी हो
और टिके भी तो कैसे ?
मेरी तो चाहत भी तुम, आलम भी तुम
तुमको न जाने कैसे-कैसे,कितना-कितना चाहूँ
माथे को चाहूँ
आखों को चाहूँ
सूरत को चाहूँ
झुमके को चाहूँ
बिंदी को चाहूँ
रेशमी बलों की खुशबु को चाहूँ
परछाईयों को चाहूँ
कि वो छूटे तो भी चाहत ना छूटे
खुद को चाहूँ ?
ना ना ना, और कैसे चाहूँ
मुझमें तो सिर्फ तुम बसी हो
तो किसको चाहूँ
मैं तो सिर्फ तुमको चाहूँ
चाहत, चाहत, चाहत
और कितना चाहूँ तुम्हें
कि तुम भी मुझको चाहो तो ये चाहत
गुमनाम न रहे