विज्ञापन

दिल से क्यूँ नहीं निकल जाते, इक पंछी बनकर।

Manoj Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिल से निकली, पलकों पर ठहरी, नमी बनकर,
        
                                                    
                            
उनकी यादें आती है जिंदगी में इक कमी बनकर।

एक कंपकंपी रुककर चलती, चलकर रुकती है,
सांसें गहरी और गहरी ठहरी है शबनमी बनकर।

शिकायत उनसे भी है और खुदा से भी कि, वो
दिल से क्यूँ नहीं निकल जाते, इक पंछी बनकर।

फिर फूल बनकर मुस्कराना, अब सजा लगती है,
वो दिन गंवारा था,जब बिखरे थे पंखुरी बनकर।

होंठ हमारे जैसे अब कर्ज लेकर ही मुस्कराते हैं,
जिंदगी,जिंदगी ही न रहा अब जिंदगी बनकर।
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

SATYENDRA KUMAR

133 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12655 कविताएं

View Profile

Pankaj Sharma

1246 कविताएं

View Profile

Bajrang Lal

19 कविताएं

View Profile