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खुशबू की तरह न आना

Manoj Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब भी तुम करीब आओ, तो,
        
                                                    
                            
खुशबू की तरह न आना,
नहीं चाहता कि, सांसों को छूकर,
तुम कहीं, हवाओं में बिखर जाओ!

कभी ,कभी, कभी भी,
सपनों में नहीं आना,
जब नींद टूट जाए तो,
नहीं चाहता कि, तुम,
आंखों से ओझल हो जाओ!

चांदनी की तरह आने से क्या होगा?
कुछ प्रहर रात्रि के बीत जाएंगे,
फिर वही धूप, वही अकेलापन,
फिर से वही नीरस लम्हें,

तुम जब भी आओ, तो,
एक हादसा बनकर, एक घाव बनकर,
बेइंतहा दर्द बनकर, कि,
जब तक जिंदा रहूँ, मेरे दिल में
तुम रहो, कभी न जाने वाली यादों की तरह!

कभी घटा बनकर, छटा बनकर,
सावन बनकर, मनभावन बनकर,
सुनहरी सुबह बनकर, शबनम बनकर,
फूल बनकर, गीत बनकर
कभी, कभी ,कभी न आना
हाँ, आओ तो, मेरा साया बनकर!
3 घंटे पहले
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