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चांदनी बनके

Manoj Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चांदनी बनके उतरके नहा लूंगा जी भर
        
                                                    
                            
तुम्हारा मन तो एक झील है मेरे दिलबर।

झुकी झुकी पलकों से दीदार कभी मत करना,
जिंदा हो जाऊंगा मैं यूँ ही फिर से मर मरकर।

खुली खुली आंखों से ही सोये रहेंगे शब भर
कभी सपनों में नहीं आना सितारे बनकर।

जलाके दीप मेरे दिल में इक मुहब्बत का
चले न जाना कहीं दूर ओ मेरे हमनजर।

न जाने कब से ये मौसम बड़ा अजीब हुआ है,
लोग कहते हैं कि पागल सा हूँ आठो पहर।
एक महीने पहले
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