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रोज मर रहे हैं

Manohar Kumar Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हसरतें पूरी करने के लिए
        
                                                    
                            
रोज मर रहें हैं जीने के लिए

एक जरूरत पूरी नहीं होती
हजार ख्वाहिश लिए बैठे हैं
ख्वाहिश पुरी करने के लिए
खुद को पराधीन किए बैठे हैं

ख्वाहिश के बिना जिंदगी
अधूरी समझते हैं लोग
अपनी ख्वाहिश के लिए
यहां रोज मरते हैं लोग।

- मनोहर कुमार सिंह
भागलपुर, बिहार।

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4 वर्ष पहले
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