बेवजह वो नहीं आते जाते
जिंदगी खा गए रिश्ते नाते।
नींद ने ऐसी बेवफ़ाई की
भरी दोपहरी सी हुईं रातें।
मिट्टी में मिलके मुक़म्मल वो हुआ
अधमरा कर दिया खाते खाते।
नामे नामे में सब उजड़ ही गया
सिफ़र ही बचा उसके खाते।
कपड़ों से, तन से उलझते काँटे
कैसे वो घर में कोई गुल लाते।
हम पे करते हैं आज शक वो दुआ
जो हमारी थी कल क़सम खाते।