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मिट्टी में मिलके मुक़म्मल वो हुआ

Manohar Dua

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बेवजह वो नहीं आते जाते
        
                                                    
                            
जिंदगी खा गए रिश्ते नाते।

नींद ने ऐसी बेवफ़ाई की
भरी दोपहरी सी हुईं रातें।

मिट्टी में मिलके मुक़म्मल वो हुआ
अधमरा कर दिया खाते खाते।

नामे नामे में सब उजड़ ही गया
सिफ़र ही बचा उसके खाते।

कपड़ों से, तन से उलझते काँटे
कैसे वो घर में कोई गुल लाते।

हम पे करते हैं आज शक वो दुआ
जो हमारी थी कल क़सम खाते।
एक महीने पहले
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