उष्ण शारद मोसम का राग बेदाग़।
पनपता जीवन में वैराग, आया लेकर एक संगीत भरा राग बेदाग़।
बचपन की सी थी कोई बात, हवा के जोके ने ले-उड़ा दिया आज बेदाग़।
मतलब का ही तो बंधन है फिर काये का विलाप।
करता चल कदमो से जीवन का आगाज, लगता नहीं क्या बेदाग़।
किल्कारी की गुंज थी, मन-प्रसन्न अति था पाकर औलाद,
क्षणभर ही लगा था जीवन का यह फल, आया दाग़ कैसे न कहता जिम्मेदारी भी यह बेदाग़।
मतलब की ही सी थी, नव जीवन जो उभर उठा था।
उसके कदमो को देखने एक फल मानो, वर्षों का था दाग़-बेदाग़।
नन्हे गूंज और उसकी हँसी ममता को भी रिज देती। माँ की, हो बातें आज आँखों से इन कदमों को देख आती।
शायद मैं लायक नहीं बेदाग़।
बाग-डोर की जीवन खाता संभला तो नहीं पर लगता है, कहीं रह गया कोई दाग़।
जख्मों के पैर नहीं जो दिखता आज, रूठता कभी मैं भी जननी से, करता जो भी खाज। देख जिम्मेदारी की आग, आज लगा दाग़, कैसे बनु, कहूं खुदको मैं बेदाग़।