सिंदूरी सी भोर है
सुरमई सी शाम
मन की आँखों में बसी
तेरी छवि अभिराम
मुरली की तान में
रम गए प्राण
कानन की गली छोड़
कित जाऊँ श्याम।
-मं शर्मा