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जागो, अभी भी समय है

Manju Chiller

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऊपर से आदेश आते हैं,
        
                                                    
                            
नीचे इंसान टूट जाते हैं।
वर्दी हो या बिना वर्दी,
क्यों अपने ही अपनों पर टूट जाते हैं?

कर्तव्य का सम्मान है,
पर क्रूरता का नहीं।
आदेश मानना ठीक है,
पर मानवता खो देना सही नहीं।

किसी को कश्मीर चाहिए,
किसी को लद्दाख की चाह।
पर इस राजनीति की आग में,
क्यों जलती रहती हर बार आम जन की राह?

जो भी सच की बात करे,
उसे देशद्रोही कह दिया जाता है।
सवाल पूछने वाले हर चेहरे पर,
संदेह का पहरा बिठा दिया जाता है।

क्या है धर्म, क्यों है धर्म,
अगर है तो प्रेम का आधार बने।
फिर क्यों इसके नाम पर,
हर आँगन में नफ़रत का व्यापार चले?

ये बातें नई नहीं हैं,
सदियों से दोहराई जाती हैं।
बस हर दौर में नई शक्ल लेकर,
इंसानियत को आज़माती हैं।

सत्ता की इस अंधी दौड़ में,
कहाँ खो गई संवेदना की राह?
कुर्सियाँ तो बदलती रहती हैं,
पर जनता ही देती हर बार आह।

कोई भूखा है, कोई पिट रहा है,
कोई खामोशी में मर रहा है।
इतिहास गवाह है हर युग का,
जो अन्याय सहता है, वही बिखर रहा है।

जाट आंदोलन हो या किसान आंदोलन,
हमने हर दृश्य अपनी आँखों से देखा है।
आवाज़ें उठीं, आँसू बहे,
फिर भी कितना कुछ अधूरा ही लेखा है।

सरकारें आती-जाती रहती हैं,
इतिहास नए अध्याय लिखता है।
पर हर पन्ने पर आम इंसान ही,
सबसे गहरा मूल्य चुकाता है।

ऐसे में याद आते हैं
क्रांतिवीर बाघा जतिन के वो शब्द महान—
"हम मरेंगे, जगत जागेगा।"
पर आज दृश्य कुछ और ही है,
लोग मरते जा रहे हैं,
और जिन्हें जागना चाहिए,
वो अब भी सोए पड़े हैं।

आओ, न धर्म से बँटें, न सत्ता से झुकें,
नफ़रत की आग में अपने घर न फूँकें।
देश केवल सीमाओं से नहीं,
जागी हुई चेतना से बनता है।
जिस दिन इंसान इंसान को समझ लेगा,
उसी दिन सच्चा भारत जन्म लेगा।
-मंजू छिल्लर
2 महीने पहले
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