सिसकती हुई भरे गले से वो मुझसे बोली
क्या मोहब्बत का अब यही अंजाम होना था
बताओ एक होकर भी हम एक ना हो सके
क्या मोहब्बत में हमें यूं नाकाम होना था
मोहब्बत में क्यों नहीं मिल सकी मंज़िल हमको
शायद हमको इश्क़ में बस बदनाम होना था
लब मेरे खामोश थे और मैं कहता भी क्या
बात कुछ ऐसी थी, आँखों से काम होना था
पड़ लिए उसने नम आँखों के आंसू मेरे
इश्क़ इक सफर है कब इसका मुकाम होना था
मेरी हथेलियों को थामे वो मुझसे बोली
इन सांसों पे कब गैरों का नाम होना था
चलो रक़्स करो, लो भरपूर मजा इस सफर का
ये मेरा इश्क़ है कब इसे तमाम होना था
-- अरमान सागरी (मनीष सराफ)
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