एक लकीर तू खींच ऐसा, मानो चंदा पे लिखा हो
या समुन्दर सी हो गहरी, या हिमालय सी शिखा हो
कठिन होगी राह तेरी,
आसान थी किसकी भला
बता दो दुनिया वालो को,
अभिमन्यु सा तू पला
भरत का वंशज है तू,
सिंह से हो खेलते
बड़ी-2 कठिनाईयो को,
आसानी से झेलते
बदल दो तकदीर अपना,
जो कि माथे पे लिखा हो
एक लकीर तू खींच ऐसा, मानो चंदा पे लिखा हो
या समुन्दर सी हो गहरी, या हिमालय सी शिखा हो
रंग दो तलवार अपनी,
रंग नशों में जो पड़ा है
भेड़ियो के बीच में,
शेर जैसे कि खड़ा है
बीच में तू झुरमुटों के,
छिप जाएगा कहीं पर
जिंदगी की राह में,
डगमगायेगा कहीं पर
टिमटिमाते से दिये सा,
बुझ जायेगा कहीं पर
बुझता दीपक नहीं तू,
सूर्य हो करके दिखा दो
एक लकीर तू खींच ऐसा, मानो चंदा पे लिखा हो
या समुन्दर सी हो गहरी, या हिमालय सी शिखा हो
वीर तो रूकते नहीं है
वीर तो झुकते नहीं है
लक्ष्य को ना प्राप्त कर लें
वो कभी थकते नहीं है
जीत होगी, हार होगी
परवाह क्या उस पार होगी
मौन हो, एकांत होकर
वो गरजते शांत होकर
रोक सासें को वो आपनी,
लक्ष्य को वो साधते हैं
खौलते तेलों में मछली,
की आंखों में झांकते हैं
तीर जो अर्जुन ने मारी
मारकर तुम भी दिखा दो
एक लकीर तू खींच ऐसा, मानो चंदा पे लिखा हो
या समुन्दर सी हो गहरी, या हिमालय सी शिखा हो