क्या प्रेम करना गुनाह है?
Is it a crime to love?
क्या प्रेम करना गुनाह है?
यदि हाँ, तो फिर यह धड़कनें किसकी इजाज़त से धड़कती हैं?
ये आँखें किसी की राह में क्यों ठहर जाती हैं?
और यह मन, हर बार किसी नाम पर क्यों मुस्कुरा उठता है?
प्रेम कोई अपराध नहीं,
यह तो ईश्वर की सबसे कोमल रचना है।
जिसने प्रेम को समझ लिया,
उसने जीवन का सबसे सुंदर अर्थ पा लिया।
प्रेम वह दीप है,
जो अंधेरों में भी उजाला बाँटता है।
वह नदी है,
जो बिना किसी स्वार्थ के बहती रहती है।
वह हवा है,
जिसे कोई कैद नहीं कर सकता।
हाँ,
वासना प्रेम नहीं होती,
स्वार्थ प्रेम नहीं होता,
छल और अधिकार का अहंकार भी प्रेम नहीं होता।
सच्चा प्रेम तो वह है,
जो सामने वाले की खुशी में अपनी मुस्कान ढूँढ़ ले,
जो बिछड़कर भी बद्दुआ नहीं देता,
बल्कि दुआओँ में उम्रभर साथ निभाता है।
समाज अक्सर प्रेम से डरता है,
क्योंकि प्रेम दीवारें नहीं देखता—
न जाति, न धर्म, न अमीरी, न गरीबी।
वह केवल इंसान को इंसान की तरह देखता है।
यदि प्रेम करना गुनाह है,
तो इस संसार की हर माँ अपराधी है,
हर पिता अपराधी है,
हर वह इंसान अपराधी है,
जिसने किसी के लिए सच्चे मन से दुआ की है।
प्रेम को दोष मत दीजिए,
दोष तो उन इरादों का होता है,
जो प्रेम का मुखौटा पहनकर
विश्वास को तोड़ देते हैं।
आइए, प्रेम को अपराध नहीं,
संस्कार बनने दें।
क्योंकि नफ़रत से सभ्यताएँ टूटती हैं,
और प्रेम से इतिहास लिखा जाता है।
प्रेम करना गुनाह नहीं,
प्रेम को कलंकित करना सबसे बड़ा गुनाह है।
-मानस कुमार कर