कहाँ तपे हो
पीले गुलाब तुम
कुंदन कैसे।
पल्लव हरे
गुल मुखड़ा पीला
बसंत जैसे।
कहाँ से पाया
गुल रूप लावण्य
प्यार हुआ क्या।
शरमाओ न
कब खिले गुलाब
बतलाओ न।tgtt
श्रृंगार किया
गुल मोहने वाला
किस ख़ुशी में।
लजाते गुल
कमसिन काया में
जैसे दुल्हन।
पीले गुलाब
जब भी हुए लाल
चुराते मन।
गुल दीवानी
असीरिया की रानी
फँसी इश्क़ में।-मनजीत शर्मा 'मीरा'