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एक आसमां मेरा भी........

Mamta Vashishtha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घर में रहकर देख लिया,
        
                                                    
                            
ये कुछ पल का रैन -बसेरा ही,
पंख खोल उन्मुक्त उडूं अब
एक आसमां मेरा भी................

पंतग की डोर संग उडान भर ली,
होंसलों ने नई कमान कस ली,
पलकें बंद करने पर ख्वाब नहीं आते,
दर्द अब अकसर दवा बन जाते,
निशा की गहराई खुद बोल उठी
हो अब नया सवेरा भी
एक आसमां मेरा भी............
प्रकृति नव संचार करें,
हाथ जोड आभार करें,
मानव जो करे अवरूद्ध मार्ग तो,
गूंज के संग चित्कार उठे,
नतमस्तक हो उठा विश्व अब, ये संघर्ष है तेरा भी
एक आसमां मेरा भी............
वही हैं सडकें , गलियां वही
घर में क्यूं कैद आदमी,
चलने को तो आतुर है मन
फिर किसकी बेडियां पैरों में बंधी?
संघर्ष करो , उदघोष करो अब ,कहती प्यारी वसुधा भी
एक आसमां मेरा भी............

- ममता वशिष्ठ
2 वर्ष पहले
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