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मेरी बातें

Mamta Tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बातों का सिलसिला खुद से मेरा इस कदर चलता रहा
        
                                                    
                            
कब हुई सुबह ये पता भी न चला मुझे,
उदासियो ने की अकेलेपन से बाते
क्या वजह है इस अकेलेपन ,
मायूस है दिल जिंदगी की ज़ख्मों से
क्या उम्मीद करे इस कमबख्त जिंदगी बातों से
आदत सी पड़ गई है अब खुद के नफरतों की बातों से
रूठ गई है मुस्कान इस दिल की गलियारों से
क्या करे क्या बोले किस से खुद की बात करूं,
समझाती फिर रही हूं खुद को अपनी गलतियों
की बात कर आसान नहीं है खुद को समझाना
अपनी गलतियों को बताकर ,
बर्बाद हुई नींद इन दिल की बातों से
क्या कसूर है इन आंखों की बातों की
एक वर्ष पहले
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