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दो जाने-पहचाने अजनबी

mamta singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुझ को मेरे नज़दीक ले आई,
        
                                                    
                            
है चीज़ बड़े काम कि तन्हाई।
हम हाॅ॑ में हाॅ॑ मिलाते रहें जबकि,
वो बात सुना रहा था सुनी सुनाई।
एक अपने सिवा नहीं कोई किसी का,
बुरे वक्त ने बात ये हमें समझाईं।
भला मैं कैसे समझती इरादे उसके,
जब जान सकी न उसको खुदाई।
बरसों दो जाने-पहचाने अजनबी,
साथ रहकर भी सहते रहे जुदाई।
2 वर्ष पहले
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Ramesh Raj

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