आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दो जाने-पहचाने अजनबी

                
                                                         
                            मुझ को मेरे नज़दीक ले आई,
                                                                 
                            
है चीज़ बड़े काम कि तन्हाई।
हम हाॅ॑ में हाॅ॑ मिलाते रहें जबकि,
वो बात सुना रहा था सुनी सुनाई।
एक अपने सिवा नहीं कोई किसी का,
बुरे वक्त ने बात ये हमें समझाईं।
भला मैं कैसे समझती इरादे उसके,
जब जान सकी न उसको खुदाई।
बरसों दो जाने-पहचाने अजनबी,
साथ रहकर भी सहते रहे जुदाई।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर