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हिंदी हूं मैं

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यात्रा मेरी शुरू हुई, उद्गम हुआ भावों से मेरा
        
                                                    
                            
एक स्वच्छंद धारा की भांति।
सब ने कहा "ठहर-ठहर, संभल-संभल कर बढ़ा कदम,
इतनी बोलियां है मार्ग में उनसे न मिल,
कितनी शुद्ध है तू मलिन हो जाएगी।"

मैंने कहां था मानना, उम्र कच्ची थी चंचल थी मैं
जो भी मिला उससे बोलती-बतियाती गई
कुछ शब्द मन को भा गए
लगाकर हृदय से उनको अपना बनाती गई।

देशज शब्द थे मेरे गांवों के किस्से थें
जिनमें बातें निराली थीं
तत्सम शब्द थे जिनमें
ऋषि मुनियों की वाणी थी
कैसे छोड़ती इनको
ये सब मेरे भारत ही के तो थे
इनको अपना कर सभी भारतीयों
के हृदयों में समाती गई।

गति थोड़ी मेरी अब मंथर हो गई थी
अल्हड़पन को छोड़कर
मैं भी परिपक्व हो रही थी
काफी समय से चल रहा एक अंतर्द्वंद्व था
विदेशी शब्दों से एक अनकहा सा युद्ध था
कैसे अपनाऊं उसे,जो मेरे देश का नहीं है
जो मेरी रीत में नहीं है, जो मेरे गीत में नहीं है।

फिर समझ आया कि वैश्विक युग है यह
मैं सब की हूं और सब मेरे ही हैं
अन्य भाषाओं ने भी मुझे
खुले दिल से है अपनाया
छोड़ दिया फिर हठ मेरा
नहीं हुई अपवित्र विदेशी शब्दों के आने से
और समृद्ध , और विकसित हुई मैं
पुरानी सोच के पाश से मुक्त हो जाने से।

बनने-बिखरने की, टूट कर फिर से गढ़ने की
अनवरत यात्रा मेरी अब भी जारी है
नए नवेले रूप में, और सज- संवर कर
मिलती रहूंगी मैं ,अस्तित्व मेरा नश्वर है
सदा रहूंगी धरा पर फलती-फूलती
हिंदी हूं मैं ,हिंदी हूं मैं, हिंदी हूं मैं।।

ममता
2 वर्ष पहले
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