कुछ लिखती हूँ
कुछ मिटाती शब्दों को
करती निरंतर प्रयास
विचारों की
माला गूंथने का
पर ये मूक शब्द
छोड़ जाते अमिट छाप........
स्मृति के कोरे कागजों पर
और स्मृति पटल पर
उभर आती अगणित कहानियां
व्यक्त करती
विचारों कि श्रींखलाओं को...........
नहीं झुठला सकती खुद को
कितनी बार मिटाती और
बनाती अपना अस्तित्त्व
कुछ स्वपनो के टूटने क़ी
झनझनाहट कुछ ............
कुछ अनसुने से शब्द
जिन्हें न व्यक्त कर पाती
खींचती अंतस पर
अनगिनत रेखाएं............
कतरन -कतरन समेटती
जोड़ती हूं शायद
कुछ को दे सकूँ सार्थक रूप
और खुद को
दे सकूं पहचान..............
समय की चुप्पी तोड़ती
निरंतर बहती
विचारों की धारा
को दे दूं अल्प-विराम।।