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विचारों की धारा

Mamta Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ लिखती हूँ
        
                                                    
                            
कुछ मिटाती शब्दों को
करती निरंतर प्रयास
विचारों की
माला गूंथने का
पर ये मूक शब्द
छोड़ जाते अमिट छाप........
स्मृति के कोरे कागजों पर
और स्मृति पटल पर
उभर आती अगणित कहानियां
व्यक्त करती
विचारों कि श्रींखलाओं को...........
नहीं झुठला सकती खुद को
कितनी बार मिटाती और
बनाती अपना अस्तित्त्व
कुछ स्वपनो के टूटने क़ी
झनझनाहट कुछ ............
कुछ अनसुने से शब्द
जिन्हें न व्यक्त कर पाती
खींचती अंतस पर
अनगिनत रेखाएं............
कतरन -कतरन समेटती
जोड़ती हूं शायद
कुछ को दे सकूँ सार्थक रूप
और खुद को
दे सकूं पहचान..............
समय की चुप्पी तोड़ती
निरंतर बहती
विचारों की धारा
को दे दूं अल्प-विराम।।
 
2 वर्ष पहले
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