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व्याकुल चितवन

Mamta Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उफ्फ्फ्फ.......
        
                                                    
                            
आ गयी फिर
शरद पूर्णिमा की रात........
घटाओं के बीच
झाँकता वो चाँद
जाने क्योंआज,
मुझे मुँह चिढ़ाता
नजर आया....
तुम्हारी यादों के
उड़नखटोले पर बैठ
जा पहुँची चाँद पर
शायद तुम्हें ढूँढने
ये सोच कर .........
की तुम मिल जाओ
कहा था न तुमने
लौटूंगा .......
तोड़ कर लाऊंगा
चाँद सितारे
और टांक दूंगा
तुम्हारे आँचल में।
नयन पिरो नयनों में,
तुमने ही तो कहा था .....
तारों की छाँव में
छोटा सा घर बनाऊंगा
आह्...........
टूटा सपनों का महल
बह गए सारे स्वप्न...
चाँद की शीतलता
कौमुदी की मादकता
असह्य पीड़ा की
अनुभूतियां......
पिघलती चाँदनीं
उफ्फ्फ्फ...
पिघलती तुम्हारी यादें.........
मृग मरीचिका बन
भटकती रही
ढूँढती रही.....
आकुल चातक सी
सुनो......
आ जाओ न
बुझा दो मेरी प्यास
बरसा दो प्रेम सुधा
रोपित कर दो
ह्रदय सिपिका
भर दो प्रेम के मोती
सुनो..........
बन जाओ न अम्बर
दो बाहों का आलिंगन
भर दो प्रेम पिपासु मन
दे दो मुझको
नवजीवन...................
स्मृतियों के नील गगन पर
चाँद बनो तुम
मेरे प्रियतम
सुरभित कर दो
व्याकुल चितवन............
-ममता गुप्ता 
2 वर्ष पहले
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