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ग़ज़ल --

Mamta Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आतिश-ए-उल्फ़त का कुछ होना असर तो चाहिए
        
                                                    
                            
जलने को परवाने जैसा भी जिगर तो चाहिए

हम भी उनसे कर तो लें इजहार उल्फ़त का अभी
हाल-ए- दिल की उनको भी रखनी ख़बर तो चाहिए

पाल तो लें शौक से हम मर्उज़-ए-उल्फ़त दोस्तो
इस की ख़ातिर मनपसंद इक चारागर तो चाहिए

ईंट गारे से मकाँ हमनें बना डाला मगर
घर को जो दे घर बना वो हमसफ़र तो चाहिए

बोलो तो किस को सुनाऊँ दास्ज़िंतान-ए- ज़िंदगी
सुनने वाला दोस्त कोई मोतबर तो चाहिए

ख़ूब है तुमनें ग़ुलाबों से तो कर ली दोस्ती
साथ खारों के भी रहने का हुनर तो चाहिए

हो खुली पलकों में आख़िर कैसे ख़्वाबों का गुज़र
नींद भी आँखों में आनी मुख़्तसर तो चाहिए

"नाज़" तहरीरें वफ़ा की आँखों में रक्खी हैं पर
पढ़ने की ख़ातिर इन्हें इक दीदावर तो चाहिए

ममता गुप्ता "नाज़"
आर्य नगर उतरौला (बलरामपुर)
एक वर्ष पहले
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