हे आराध्य कृष्ण! कुछ प्रश्न हैं तुमसे पूछने
उठ रहे हैं जो, आज के इस परिप्रेक्ष्य में ।
तुम तो दृष्टा हो, भविष्य सब हो जानते
किंतु मैं तो केवल जो घट चुका है
या घटित हो रहा है वही हूं जानती।
यह विचार आता है बारंबार
क्यों तुमने द्रौपदी की अस्मिता बचाई?
चीरहरण रोकने में लगा दिया तुमने
क्यों अंतहीन वस्त्र का अंबार?
सती थी पांचाली स्वयं ही
चाहती तो अपनी शक्ति से ही
दुशासन को भस्म कर देती
अपने केशों को छूने से पहले ही
उसके अस्तित्व को नष्ट कर देती।
फिर ऐसा क्यों कर न हुआ?
स्त्री को सुरक्षा के लिए
एक पुरुष की ही आवश्यकता है
क्यों तुमने ऐसी रीत चलाई?
नरकासुर के कारागार से
सोलह हजार राजकुमारियां
मुक्त कर लाए,
उनके चरित्र पर जब उंगली उठी
तब तुमने उन्हें पत्नी का स्थान देकर
जग में उनकी लाज बचाई।
संशय की कालिमा
तब भी स्त्री के ऊपर थी
शुचिता के इस भार से
क्यों तुम उसे न मुक्त कर पाए?
तुम अब सब सशरीर नहीं हो इस युग में
किंतु उसे युग में भी तो तुम्हें ज्ञात होगा
कि असंख्य दुशासन होंगे जो स्त्री के
चीर हरण को आतुर होंगे...
कैसे नाश होगा इन पापियों का ,नहीं जानती
कैसे रुकेगा आधी जनसंख्या पर
अत्याचार का अनवरत
यह सिलसिला, नहीं जानती
बहुत हुआ, अब बस हुआ...
यही प्रार्थना है तुमसे
मां आदिशक्ति का आविर्भाव हो
हर नारी दुर्गा बने, चंडी बने
हर दुशासन का अब बस नाश हो।।
-ममता