तुमसे रिश्ता ना टूटेगा,
तुम व्यर्थ ही चिंतित हो,
व्यर्थ ही शशांकित हो।
और इसी अनकही पीड़ा में,
जागते हो रात-रात भर,
और मुझे भी जगा रहे हो।
नित्य नीर नयनों से बहा रहे हो,
संग में मुझे भी रुला रहे हो।
तुम्हें क्या लगता है?
तुम बताओगे नहीं,
तो मुझे पता नहीं चलेगा?
अरे, तुम भूल क्यों रहे हो कि—
हमारी रूहें जुड़ चुकी हैं,
एक-दूजे के साथ में।
डर रहे हो किस बात से?
जब मिलाया है हमें,
स्वयं हमारे भोलेनाथ ने।