देखा है हमने मोहब्बत को क़रीब से,
ये वो मर्ज़ है जो मिलता है नसीब से,
आठों पहर बस बेख़ुदी सा वो एक नशा है,
यूँ खोता है ये दिल ख़्वाबों में अजीब से,
चमन भी बदला नहीं, नसीम भी वोही है,
नज़ारे भी नज़र आते है नज़रें अदीब से,
निगाहें हटती ही नहीं उनकी राहों से,
होने लगा प्यार जैसे वो बा-नसीब से,
वा हो जाती है नफ़रत गर्मी-ए-इश्क़ से,
रक़ीब लगने लगते है सारे हबीब से,
तन्हाई में गुफ़्त-ओ-गू, कारवाँ में तन्हाई,
मत पूछ हाल-ए-दिल, होते है मुहीब से,
आरज़ू बस इतनी कि रहे तेरे पहलू में,
ख़्वाब से ये मंज़र जाये ना नसीब से,
ये आशियाँ आबाद रहे बाद हश्र के,
इल्तिजा काफ़िर की तो है ये मुसतजीब से....