विज्ञापन

बिखरे अक्स में खुद को बिखरते देखती हूँ

madhavi padiya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बिखरे अक्स में खुद को बिखरते देखती हूँ,
        
                                                    
                            
बिखरे अक्स को समेटे कोई तो चुभती हूँ।

अक्सर काँप उठती हूँ इस ख्याल से दोस्त,
तेरी जिंदगी से जब खुद को जो मिटाती हूँ।

मेरे ख्वाब तो तूफानों में उजड़ यूँ गये,
ख्वाब किसी के न टूटे बस यही चाहती हूँ।

वो शख़्स तो अब इस राह से गुरजता नहीं,
ना हीं मैं दरवाजे को उम्मीद से देखती हूँ।

अब ना होती है कोई आहट या दस्तक,
दिल की सुनसान जगह महसूस करती हूँ।
- माधवी आशरा
2 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all