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मिटा बन अकेला।

LS Kuntal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सघन वन वो उपवन, वो जंगल में मंगल,
        
                                                    
                            
बता तू जमीं पे, कहाँ रह गया है।
मिटाया मनुज ने है निज तरु अनुज को,
अरे स्वार्थ में किस तरह बह गया है।
न सोचा-विचारा, क्या होगा हमारा,
संभल जा समय है, क्या मिट के रहेगा,
ये सूखी धरा है, न पानी गिरा है,
न आऊंगा बादल भी ये कह गया है ॥१॥

न ऐसा था पहले, कोई कुछ भी कहले,
तू आवाज अपनी नहीं सुन रहा है।
ये लालच का जाला, बड़े कष्ट वाला,
खुद ही फंसेगा जो, तू बुन रहा है।
न परदा हटाया, जो तरु को मिटाया,
तू अपने ही हाथों से लुट के रहेगा,
न जाने न माने, न सुनता दीवाने,
अपनी ही अपनी बजा धुन रहा है ॥२॥

अरे तरु का जीवन, तेरा ही तो है धन,
उपहार ऐसा ये तुझको मिला है।
मगर तू है चंचल, मिटा देगा अंचल,
सदियों से तेरा यही सिलसिला है।
हरा बांध ढहकर, मिटेगा तू बहकर,
सभी कष्ट सहकर बचा लो कहेगा;
भू जलमगन है, बचा बस गगन है,
खाना पड़ेगा जो ये फल मिला है ॥३॥

हू रोता अकेला, न खुशियों का मेला,
तेरा कर्म ही बस बचा रह गया।
तेरा धन वो दौलत, बड़ा घर वो शोहरत,
नहीं काम आया, सभी बह गया।
अगर मान जाता, न प्रलय बुलाता,
अब न बचेगा ले तू भी बहेगा,
प्रकृति से खेला, मिरा बन अकेला,
इतिहास फिर से सही कह गया है।।
एक घंटा पहले
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