विज्ञापन

महायोद्धा कर्ण

Lavkush Awasthi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            महायोद्धा कर्ण
        
                                                    
                            
भास्कर का तेज था, जो धार में बहता रहा,
सूतपुत्र के ताने भी, वो हँसते-हँसते सहता रहा।
था खड़ा जो अंगराज, वीरता की ढाल बन,
काल भी रुकता जहाँ पर, धनुष की टंकार बन।
इंद्र आए द्वार पर, तो शीश ना झुकाया था,
काट कवच-कुंडल अपने, दान में लुटाया था।
प्राण माँगे थे सती ने, तो अभय का दान दिया,
मित्र की ख़ातिर ही उसने, धर्म पर बलिदान दिया।
काँपता था कुरुक्षेत्र, जब बाण वो चलाता था,
काल के भी चक्र को, वो शौर्य से घुमाता था।
किस्मतों के खेल में, पर रथ का पहिया धँस गया,
श्राप गुरु का आड़े आया, वीर रण में फँस गया।
छल हुआ उस वीर के साथ, कान्हा ने इशारा किया,
तीर अंजलि-बेध का, फिर पार्थ ने प्रहारा किया।
जीतकर भी हार अर्जुन, ढूँढता प्रमाण है,
'स्वस्तिक' इस संसार में, बस कर्ण ही महान है।
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile