महायोद्धा कर्ण
भास्कर का तेज था, जो धार में बहता रहा,
सूतपुत्र के ताने भी, वो हँसते-हँसते सहता रहा।
था खड़ा जो अंगराज, वीरता की ढाल बन,
काल भी रुकता जहाँ पर, धनुष की टंकार बन।
इंद्र आए द्वार पर, तो शीश ना झुकाया था,
काट कवच-कुंडल अपने, दान में लुटाया था।
प्राण माँगे थे सती ने, तो अभय का दान दिया,
मित्र की ख़ातिर ही उसने, धर्म पर बलिदान दिया।
काँपता था कुरुक्षेत्र, जब बाण वो चलाता था,
काल के भी चक्र को, वो शौर्य से घुमाता था।
किस्मतों के खेल में, पर रथ का पहिया धँस गया,
श्राप गुरु का आड़े आया, वीर रण में फँस गया।
छल हुआ उस वीर के साथ, कान्हा ने इशारा किया,
तीर अंजलि-बेध का, फिर पार्थ ने प्रहारा किया।
जीतकर भी हार अर्जुन, ढूँढता प्रमाण है,
'स्वस्तिक' इस संसार में, बस कर्ण ही महान है।