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बेटी की विदाई

Lavkush Awasthi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            डोली उठी जब आँगन से, रो पड़ा घर का हर कोना,
        
                                                    
                            
मुश्किल था उस विदा होती चिड़िया का चुप होना।
पकड़ के उंगली पापा की, जिसने चलना सीखा था,
आज उसी ने कातर स्वर में, रोकर उनसे पूछा था—
"क्या सच में इस घर से मेरा, रिश्ता अब टूट गया पापा?
जिस आँगन में जनमी-पली, वो आँगन कैसे छूट गया पापा?"
छोटा सा कोना भी क्या, मेरे हिस्से में अब शेष नहीं?
पराया कर दिया मुझे, क्या बचा अब मेरा कोई देश नहीं?"
समझकर ऐसी बातें उसकी, कलेजा माँ का फटता था,
जुदा हो रहा था जो आँचल, वो हाथ से कहाँ छूटता था।
भाई भी बैठा कोने में, सुबक-सुबक कर रोता है,
बचपन की उन लड़ाईयों को, याद कर-कर के खोता है।
जिस बाप ने कभी न सीखे थे, आँसू आँखों में लाना,
झुक गया आज वो पर्वत भी, मुश्किल था उसे समझाना।
कलेजे के टुकड़े को अपने, जब उसने गले लगाया था,
मानो उसकी पूरी दुनिया का, सब कुछ ही लुट आया था।
2 महीने पहले
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