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"यह कैसी माँ की पूजा "

Lakshman Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            करोड़ों माओं की मूर्तियाँ
        
                                                    
                            
बनाई जाती हैं,
दुर्गा माता, काली माता,
शीतला माता, संतोषी माता
और भी अनगिनत
माओं की मूर्तियों
की प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है।
कभी शारदीय पूजा,
कभी वासंती पूजा
के लिए मूर्तियाँ
बनाई जाती हैं।
दिन-रात उनकी पूजा
के लिए यज्ञ-अनुष्ठान
किए जाते हैं।
"कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति"
और दुर्गा सप्तशती
मंत्र का जप होता है।
करोड़ों रुपये खर्च करके
पंडाल बनाए जाते हैं।
दांडिया का नाच भी
होता है मनोरंजन के लिए,
DJ की धुन पर
सब नाचते हैं।
पर गाँव में एक माँ
अकेली रहती है।
वृद्धा होने के बावजूद
घर-खलिहान की देखभाल
करती है और अपनी हथेली
को जलाती रहती है।
चार बच्चों की माँ
रहते हुए, इस माँ
को कोई देखने नहीं आता।
सब बच्चे शहरों के
पंडालों में घूम रहे हैं
और माओं की पूजा कर रहे हैं,
पर अपनी माँ अपने
बच्चों के लिए तरस रही है।
-लक्ष्मण झा परिमल
 
2 घंटे पहले
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