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"व्यंग का आईना"

Lakshman Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पता नहीं लोगों ने
        
                                                    
                            
व्यंग्य की विधा
का आविष्कार ही
क्यों किया,
रहने देते साहित्य
को श्रृंगार-रहित,
जब आप व्यंग्य को
हृदय से स्वीकार ही
नहीं करते हो।
हम प्रशंसकों को
अपना बना के रखते हैं,
वाहवाही का स्वाद लेते हैं,
आप भी उन चापलूसों को
दरबारी कवि समझते हैं।
व्यंग्य से पर वे ही तिलमिला जाते हैं,
जो आस्तीनों में साँप छुपाए रखते हैं।
कई तो व्यंग्यों से ही सुधर जाते हैं,
आईना देख खुद ही निखर जाते हैं।
हमें प्रशंसा-प्रस्तुति
स्वीकार है पर
हास्य-व्यंग्य
सब बेकार है।
व्यक्ति वही सर्वश्रेष्ठ होता है,
जो व्यंग्य को भी
गले लगाता है।

- डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'
2 महीने पहले
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