लेखनी याचना का पात्र नहीं,
यह सृजन का अखंड तप है।
झोली पसारना धर्म नहीं इसका,
यह तो स्वयमेव वरदान का शिल्प है।
प्रशस्ति, सम्मान, पुरस्कार —
यदि पथ में स्वतः आ गिरें,
तो कृतज्ञ हृदय से स्वीकारो,
पर पलक-पाँवड़े कभी न बिछाओ।
'प्रतिदान' की प्रतीक्षा में
कलम को भिक्षुक न बनाओ।
सृजन का धर्म माँगना नहीं,
जलना है, प्रकाश बाँटना है।
देखो 'रश्मिरथी' के दिनकर को —
क्या कभी याचना में झुके?
'साकेत' के मैथिलीशरण,
'मधुशाला' के हरिवंश —
क्या प्रशंसा के द्वार खटखटाए?
नहीं।
उनकी लेखनी ने स्वयं
अपना आकाश रचा,
अपना मार्ग प्रशस्त किया।
शब्द जब तप से तपते हैं,
तो संसार स्वयं नतमस्तक होता है।
सो तुम लिखो — मौन, अडिग, अनासक्त।
यश आए तो आशीष मान लेना,
न आए तो भी रचना का धर्म न छोड़ना।
यही लेखक की मर्यादा है,
यही सृजन का शाश्वत पंथ है।