विज्ञापन

"झींगुर जी का हिसाब

Lakshman Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उम्र हो चली सत्तर पार,
        
                                                    
                            
घुटनों में अब वो धार कहाँ?
झींगुर जी बोले बार-बार,
"लाइन में लगना अधिकार कहाँ?
बुफे का युद्ध, धक्का-मुक्की,
पत्तल पकड़ो, पूड़ी ढूँढो,
बुजुर्ग हूँ मैं, शान का भूखा,
रसगुल्ले को लाइन में क्यों सूँघो?"
कल सुबह जो कार्ड आया,
दरवाजे के नीचे से सरक कर,
न घंटी बजी, न 'राम-राम' हुआ,
बस कागज़ का टुकड़ा धमक कर।
खोल कर देखा, खून खौला,
"डॉ. झींगुरु" लिखा था साफ़,
बोले — "नाम की इज़्ज़त न कर सके,
तो गिफ्ट भी होगा आधा-हाफ़!"
पत्नी बोली, "जाना पड़ेगा,
बुजुर्ग हो तुम मोहल्ले के,
न जाओगे तो लोग कहेंगे,
ऐंठ बहुत है इनके छल्ले में!"
निकले झींगुर जी बन के नेता,
कुरते में दो नीतियाँ रख कर,
बाएँ जेब में 501 की शान,
दाएँ जेब में 151 का डर।
हॉल में घुसे, मुआयना किया,
पनीर रूखा, नान थी ठंडी,
बुफे की लाइन साँप सी लम्बी,
और मिठाई पर मक्खी मंडी।
मुस्कुराए झींगुर, बोले मन में,
"अपमान का ब्याज चुकाऊँगा,
नाम बिगाड़ा तुमने मेरा,
मैं लिफाफा घटाऊँगा!"
झट 151 वाला निकाला,
डाल दिया कन्यादान में,
रजिस्टर पे लिखा — "डॉ. झींगुरु",
और बुदबुदाए अभिमान में —
"जैसा कार्ड, वैसा व्यवहार,
जैसा भोज, वैसा उपहार!"
घर लौटे तो पत्नी पूछे,
"कैसा रहा जलसा जी?"
बोले झींगुर जी जेब टटोल,
"501 बच गया, समझो फ्री!
नाम जो बिगाड़ोगे अगली बार,
तो खाली हाथ ही लौटोगे यार!"
- लक्ष्मण झा परिमल
 
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3563 कविताएं

View Profile