विज्ञापन

"कमेंट बॉक्स के महाकवि"

Lakshman Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम कभी-कभी दृग्भ्रम के
        
                                                    
                            
शिकार हो जाते हैं,
भटके हुए राही-से,
किसी के कमेंट बॉक्स में घुस जाते हैं।
वहाँ अपना काव्य-कलश
लेकर प्रदर्शन पर उतर आते हैं,
भले ही मूल पोस्ट में
बारिश की भविष्यवाणी
चल रही हो,
हम अपनी धूप-छाँव की
ग़ज़ल सुना आते हैं।
कोई बेचारा कविता लिखे,
कोई लेख रचता है,
संस्मरण की नाव में
लघुकथा का दीप जलता है।
विषय होता है "आम के फायदे",
पर हम वहाँ "इमली का विलाप"
महाकाव्य पढ़ जाते हैं।
कोई सराहे तो ठीक,
न सराहे तो भी ठीक,
क्योंकि हम तो स्वयंभू
साहित्य-सेवक हैं,
कमेंट बॉक्स ही अपना मंच,
अपना टॉक-शो।
प्रशंसा की फसल बोने आए थे,
पर यहाँ तो सब
अपनी-अपनी खेती कर रहे हैं!
अब करें तो क्या करें,
धर्मसंकट भारी है—
न "आभार" कह सकते,
न "धन्यवाद" लिख सकते,
क्योंकि प्रशस्ति-पत्र बाँटने आए थे,
पर यहाँ उल्टा हमें ही
शॉल ओढ़ानी पड़ गई।
प्रशस्ति बाँटने का शौक है
तो अपनी दीवार सजाओ,
दूसरे के आँगन में
कवि-सम्मेलन मत लगाओ।
क्योंकि अंत में
लेखक भी यही सोचता है—
"मैंने लिखा था ‘श्राद्ध’,
ये सुना रहे ‘शादी’ के गीत...
धन्य हो प्रभु, धन्य हैं
आपके कमेंट-बॉक्स के मीत!"
- लक्ष्मण झा 'परिमल'
 
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all