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"बड़ी प्रशस्ति का बुरा अंजाम "

Lakshman Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अजब हो गया,
        
                                                    
                            
कल रात सपने में
मेरे साहित्यिक ग्रुप की
एडमिन से मुलाकात हो गई।
बोलीं - "परिमल जी, आप लिखते अच्छे हैं,
पर आप तो बड़ी-बड़ी प्रशस्ति लिखते हैं,
दूसरों की रचनाओं को नज़रअंदाज़ करते हैं,
उन्हें भी आपकी चाह होती है।"
मैंने बात शिरोधार्य की,
और सुबह से ही लग गया लाइन में।
मैं बड़ी-बड़ी प्रशस्ति लिखता हूँ,
पूरा समीक्षा-पुराण ही रच देता हूँ -
"आपकी लेखनी में भावों का सागर है,
शब्दों में जादू है, अद्भुत है, अपूर्व है!"
पर यहाँ तो मेरा ही
आउटगोइंग हो रहा था,
इनकमिंग का तो जैसे
नेटवर्क ही गायब था।
मेरी तीन पैराग्राफ की प्रशस्ति पर
उधर से एक अंगूठा आता है - 👍
और कभी-कभी तो वो भी नहीं।
अब मैं रोज सपने में
उसी एडमिन का इंतजार करता हूँ,
ताकि कह सकूँ -
"मैडम, मैं तो बड़ी-बड़ी प्रशस्ति लिखता हूँ,
पर यहाँ लेखक वो बड़े हैं,
संवाद करना शान के खिलाफ समझते हैं,
आभार के दो शब्द लिखने में
उनकी कलम को ही लकवा मार जाता है!"
-लक्ष्मण झा 'परिमल'
 
2 सप्ताह पहले
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