अबोध बालक को सभी
प्यार करते हैं,
सब लोग उसे पुचकारते हैं
और सीने से लगाए रखते हैं।
बच्चे तो बच्चे होते हैं,
बड़े प्यारे होते हैं,
उसे तनिक आभास भी नहीं होता
कौन अपना है, कौन पराया।
उसे तो प्यार चाहिए,
दुलार चाहिए,
जो उसकी उँगली थामे,
उसी के संग चल देता है।
कोई भेद-भाव नहीं,
कोई धर्म की दीवार नहीं,
वैमनस्यता और असहिष्णुता की
बातें जानना तो दूर,
किसी से कभी रूठता ही नहीं।
फिर धीरे-धीरे उम्र बढ़ती है,
कंधों पर घमंड चढ़ता है,
अपना-पराया पहचान जाता है,
मैं ही श्रेष्ठ हूँ, यह भाव गहराता है।
ईगो की काली चादर ओढ़ लेता है,
जाति, धर्म के पचड़ों में फँसता जाता है,
नाचता है अपने ही ताल पर,
किसी की परवाह नहीं करता है।
व्याज-स्तुति उसको प्यारी
लगने लगती है,
झूठी तारीफ सुनने को
सदा बेहाल रहता है,
इर्द-गिर्द उनकी सभाओं में
चापलूस रहा करता है।
उन्मत्त हाथी-सी चाल हो जाती है,
मैं बड़ा, तू छोटा - यही राग अलापता है,
श्रेष्ठता के नशे में चूर,
खुद को ही खुदा समझता है।
फिर एक समय आता है,
जब यह मानव फिर से
बालक बन जाता है,
अपनी गलतियों को समझने लगता है,
सब घमंड, सब ईगो, सब श्रेष्ठता का बोझ
मानो मिट्टी में मिल जाता है,
पश्चाताप की गलियों में
घूमने लगता है,
लोगों से प्रेम करता है,
सब उम्र के लोगों से
मिलने को जी करता है,
हर दिल में खुद को ही ढूँढ़ता है।
हम बालक ही सदा
बनना चाहते हैं
क्योंकि “बच्चे सबसे अच्छे”
कहे जाते हैं !!
-लक्ष्मण झा ‘परिमल’