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"आजकल के सुर-सम्राट"

Lakshman Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आजकल हर गली में
        
                                                    
                            
सुर-सम्राट घूम रहे हैं,
मोबाइल हाथ में लिये,
खुद को रफी मान रहे हैं।
स्टार ट्रैक बजता है,
होंठ सिर्फ हिलते हैं,
सुर कहीं और जाते हैं,
गीत कहीं और मिलते हैं।
रियाज़ के नाम पर
दो रील बना डाला,
बेसुरे गले को
ऑटो-ट्यून ने संभाला।
फेसबुक पर डाला,
तो दोस्तों ने लिखा - वाह,
बीवी बोली - बंद करो, सोने दो, आह!
इंस्टा पर फिल्टर से
चेहरा चमकाया,
गले का क्या करें,
जो बचपन से ही भटकाया।
कमेंट में सबने कहा –
"आप तो छा गये",
घर में बच्चों ने कहा –
"पापा, आप क्यों गा गए?"
कौआ बेचारा भी
अब कान बंद करता है,
जब आदमी कोयल
बनने का स्वांग भरता है।
कहते हैं कला
साधना मांगती है,
ये रील नहीं, तपस्या मांगती है।
तो हे मेरे बेसुरे भाई,
नीचे आ जाओ,
पेड़ से उतरो,
धरती पर गुनगुना जाओ।
सबको गायक बनना
जरूरी तो नहीं,
कभी-कभी सुनना भी
गायन से कम नहीं।
-लक्ष्मण झा’परिमल’
 
7 घंटे पहले
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